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दीप्ति कुशवाह की कविताएँ
ऋतुएँ आती रहेंगी
जंगलों के कंधों को छू कर
घास के रंग उलटती-पलटतीं
पहाड़ों के रंग बदलती हुईं


रवि राहगीर की कविता
माड़ की छोरियाँ
प्यार करने की तगड़ी सजा पाती हैं
कूटी जाती हैं
पीटी जाती हैं
उन्हें डाँट पिलाई जाती है :
“छोरी तू तो हमारा नाम डुबाकर छोड़ेगी
खानदान को कतई पैंदे में ले जाएगी।”


दहकते इश्तिहार
उसे पता था कि ये इश्तिहार उसके लिए नहीं हैं। न तो उसका मतदाता पहचान पत्र है और न ही जेब में रुपये।
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