top of page


गौरव अरण्य की कविताएँ
गणित इतना आसान भी नहीं
जितना दिखाई देता है
वह अक्सर
तपती धूप में
पड़े मोम की तरह
धीरे-धीरे पिघल जाता है


कोलम्बिया नदी : एक शब्द-चित्र
जहाज़ से देखने पर यह बिल्कुल किसी चित्रकार के लिये मुफ़ीद दृश्य जैसा दिखता था। हरा पहाड़, सफ़ेद घर, नीला आकाश, हल्की हरी नदी पर बहते सफेद याॅट।


ताकि स्मृति बची रहे (मंगलेश डबराल की कविता)
जो भी दिल्ली पहुँचता है, यह महानगर उसे बदल लेता है। कभी-कभी तो इस परिवर्तन का पता तक हमें नहीं लग पाता है। दिल्ली के जादू से विरले ही बच पाते हैं। मंगलेश इसके अपवाद नहीं थे।
bottom of page
%20(3).png)