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अनिल गंगल की कविताएँ
किसके खेत में भूख उगती है?
किसके घर में नफ़रत पकती है?
किसकी ज़ुबान पर ताला लगता है?
और किसके हाथ में इतनी ताक़त आ जाती है
कि वह अपने झूठ को देश का सच कह सके?


पैमाना सिर्फ़ एक है कि लिखाई अच्छी होनी चाहिए
मैं नहीं मानती कि स्त्रीवाद कभी भी ‛पूँजीवाद’ जैसी किसी भी दूसरों के दमन और शोषण पर आधारित व्यवस्था का समर्थक हो सकता है।


संदीप निर्भय की कविताएँ
जीवन की गाड़ी को धकियाकर ले आया तीस के पार
क्या बाक़ी का बचा जीवन यों ही गुज़र जाएगा
इन ठग-ठगोरी भारतीय रेलों में
जहाँ-तहाँ ज़िम्मेदारियों का थैला कंधों पर लिए
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