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मिथ्या आख्यान बनाम सत्य के प्रतिरोध
स्वाभाविक सवाल उठ सकता है कि सत्य इतना हाशिए पर कैसे चला गया? लोग इस हद तक उदासीन कैसे हो गए कि उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं रही कि वे जो मानते हैं, उसका तथ्यात्मक आधार है या नहीं?


नसीब का पत्थर
शिकार से कहीं ज़्यादा मेरी दिलचस्पी उस इंतज़ार में थी, जो शिकार से ऐन पहले आता है—मछुआरों को जाल बिछाते देखना, उनका घात लगाए बैठे रहना और साँस तक संभाल-संभालकर लेना, ताकि हवा की कोई लहर उनके जिस्म की गंध परिंदों तक न पहुँचा दे।


आज की ईरानी कविताएँ
जब वह सरहदों पर होती है।
कँटीला तार उसकी स्कर्ट चीर देता है।
फूल चीख़ उठते हैं
और पंखुड़ियाँ कँटीली बाड़ पर
टंगी रह जाती हैं
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