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बेहतर दुनिया के लिए छोटे-छोटे स्वप्नों की पोटली
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जब जीवन के संघर्षों का अनुभव, उन्हें देखने वाली सूक्ष्म दृष्टि, उन्हें भीतर तक महसूस करने वाली संवेदना और उन्हें अभिव्यक्त करने वाली सधी हुई भाषा एक जगह आ मिलती है, तभी ‛पोटली के दाने’ जैसा संग्रह संभव होता है।


ईश्वर से अधिक मनुष्य
यदि यह संसार केवल प्रतीक्षालय है, तो यहाँ इतनी सुंदर खिड़कियाँ क्यों हैं? पेड़ों पर धूप इतनी देर क्यों ठहरती है? बारिश के बाद मिट्टी की गंध इतनी गहरी क्यों होती है? किसी बूढ़े पिता के चेहरे पर एक नई झुर्री देखकर भीतर कुछ टूटता क्यों है?


शेरदा ‘अनपढ़’ की कविताएँ
मिश्री से भी ज़्यादा मीठी लगने वाली, क्या तुम कार्तिक महीने का शहद हो? या फिर पूस के महीने में पड़ने वाले पाले जैसी कोई चीज़? ओ चंचल लड़की तुम कौन हो?
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