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दिव्या श्री की कविताएँ
नहीं हुई थी कभी
इससे पहले प्रेम और घृणा एक साथ
एक साथ इतनी ज़ोर की पीड़ा कभी नहीं हुई थी
जैसे टूटी हो मेरे दिल की हड्डी
जबकि होती नहीं है वह


गौरव अरण्य की कविताएँ
गणित इतना आसान भी नहीं
जितना दिखाई देता है
वह अक्सर
तपती धूप में
पड़े मोम की तरह
धीरे-धीरे पिघल जाता है


कोलम्बिया नदी : एक शब्द-चित्र
जहाज़ से देखने पर यह बिल्कुल किसी चित्रकार के लिये मुफ़ीद दृश्य जैसा दिखता था। हरा पहाड़, सफ़ेद घर, नीला आकाश, हल्की हरी नदी पर बहते सफेद याॅट।
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