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ईश्वर से अधिक मनुष्य
यदि यह संसार केवल प्रतीक्षालय है, तो यहाँ इतनी सुंदर खिड़कियाँ क्यों हैं? पेड़ों पर धूप इतनी देर क्यों ठहरती है? बारिश के बाद मिट्टी की गंध इतनी गहरी क्यों होती है? किसी बूढ़े पिता के चेहरे पर एक नई झुर्री देखकर भीतर कुछ टूटता क्यों है?


शेरदा ‘अनपढ़’ की कविताएँ
मिश्री से भी ज़्यादा मीठी लगने वाली, क्या तुम कार्तिक महीने का शहद हो? या फिर पूस के महीने में पड़ने वाले पाले जैसी कोई चीज़? ओ चंचल लड़की तुम कौन हो?


धर्मेश सिंह की कविताएँ
मेरे भीतर की स्त्री और उसका पुरुष
कभी एक-दूसरे से लिपटकर रो नहीं पाए
कि कहीं उनके प्रेम को
कमज़ोर या कायर न समझ लिया जाए
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