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जितेन्द्र विसारिया की कविताएँ
मैं-मैं हम पता नहीं
कब से कर रहे हैं
हम होकर उस
सँकरी गली में
चलकर देखें
जहाँ दो नहीं
समाते


अंधेरा विलो, सोती हुई औरत
एक बार जब आप इसे गौर से देखना शुरू करते हैं, तो इंसानी कान, इसकी संरचना काफी रहस्यमय लगती है। इसमें मौजूद ये सारी अजीबोगरीब घुमाव, उभार और गड्ढे। शायद क्रमागत विकास ने इस विचित्र आकार की चीज को ध्वनियों को इकट्ठा करने या अंदर मौजूद चीजों की रक्षा करने का सबसे अच्छा तरीका माना हो।


बेहतर दुनिया के लिए छोटे-छोटे स्वप्नों की पोटली
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जब जीवन के संघर्षों का अनुभव, उन्हें देखने वाली सूक्ष्म दृष्टि, उन्हें भीतर तक महसूस करने वाली संवेदना और उन्हें अभिव्यक्त करने वाली सधी हुई भाषा एक जगह आ मिलती है, तभी ‛पोटली के दाने’ जैसा संग्रह संभव होता है।
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