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विगत की व्याधि
आहिस्ता-आहिस्ता कमर से चढ़ती हुई गर्दन के करीब आते-आते ठीक उन दिनों के जैसे उनकी देह गंध ने पीछे से उसे अपनी आगोश में भर लिया। मसालों में लिपटी हुई तेल-घी की मिश्रित गंध हमेशा की तरह उसकी दाईं ओर से तीक्ष्ण हो गई।


दीप्ति कुशवाह की कविताएँ
ऋतुएँ आती रहेंगी
जंगलों के कंधों को छू कर
घास के रंग उलटती-पलटतीं
पहाड़ों के रंग बदलती हुईं


रवि राहगीर की कविता
माड़ की छोरियाँ
प्यार करने की तगड़ी सजा पाती हैं
कूटी जाती हैं
पीटी जाती हैं
उन्हें डाँट पिलाई जाती है :
“छोरी तू तो हमारा नाम डुबाकर छोड़ेगी
खानदान को कतई पैंदे में ले जाएगी।”
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