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निकानोर पार्रा की कविताएँ
गुज़र चुका है भूतकाल
वह केवल स्मृति में है:
एक नोंचे हुए गुलाब से
एक और पंखुड़ी नहीं खींची जा सकती


गायब होती दुनिया
सुबह का आसमान वैसा कभी नहीं रहता है, जैसा दोपहर का रहता है। दोपहर का आसमान वैसा कभी नहीं रहता है, जैसा शाम का रहता है। शाम का आसमान वैसा कभी नहीं रहता है, जैसा रात का रहता है...! आसमान समुद्र-सा ही होता है, उसमें बादलों की लहर रहती है। चंद्रमा, सूरज, तारे आसमान के जीव-जंतु हैं!
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