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ऐन कार्सन से विल एटकिन की बातचीत
मैं यह जानने के लिए लिखती हूँ कि किसी चीज के बारे में मैं वास्तव में क्या सोचती हूँ।


सशक्त वैश्विक परिदृश्य के बाद हुआ हिन्दी साहित्य का आगाज!
आम जन अपने सामने घट रहे इतिहास की विकरालता और महत्व को अक्सर नहीं समझता। उनकी सीमित सोच और क्षमता उन्हें बाध्य करती है कि वह बस बदलाव के उसके तात्कालिक जीवन पर पड़ रहे प्रभाव से प्रेरित होकर अपने स्वार्थों को बचाए रखने के लिए जूझता रहे। यह तो एक पीढ़ी के बाद पता चलता है कि उस बदलाव के दौर में उस पीढ़ी के सदस्यों ने परिवर्तन की लहरों पर सवारी की या उसके वेग में बह गए।
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