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शेरदा ‘अनपढ़’ की कविताएँ
मिश्री से भी ज़्यादा मीठी लगने वाली, क्या तुम कार्तिक महीने का शहद हो? या फिर पूस के महीने में पड़ने वाले पाले जैसी कोई चीज़? ओ चंचल लड़की तुम कौन हो?


धर्मेश सिंह की कविताएँ
मेरे भीतर की स्त्री और उसका पुरुष
कभी एक-दूसरे से लिपटकर रो नहीं पाए
कि कहीं उनके प्रेम को
कमज़ोर या कायर न समझ लिया जाए


घनश्याम की कविताएँ
तुम आग को आग नहीं लिख सकते
न रोटी को रोटी लिख सकते हो
न फूल को फूल ही
तुम्हें लिखना इतना ही पसंद है
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