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सशक्त वैश्विक परिदृश्य के बाद हुआ हिन्दी साहित्य का आगाज!
आम जन अपने सामने घट रहे इतिहास की विकरालता और महत्व को अक्सर नहीं समझता। उनकी सीमित सोच और क्षमता उन्हें बाध्य करती है कि वह बस बदलाव के उसके तात्कालिक जीवन पर पड़ रहे प्रभाव से प्रेरित होकर अपने स्वार्थों को बचाए रखने के लिए जूझता रहे। यह तो एक पीढ़ी के बाद पता चलता है कि उस बदलाव के दौर में उस पीढ़ी के सदस्यों ने परिवर्तन की लहरों पर सवारी की या उसके वेग में बह गए।


नाना पाटेकर : मेरे लिए तुम गीत हो
नाना के चेहरे पर अभिनय दिखाई ही नहीं देता। एक किरदार दिखता है, जो जैसे अपने भीतर कुछ छिपाकर बैठा है। कभी वह गुस्सा है, कभी पश्चाताप, कभी हिंसा, कभी अकेलापन और कभी अचानक फूट पड़ने वाली हँसी।


मिथ्या आख्यान बनाम सत्य के प्रतिरोध
स्वाभाविक सवाल उठ सकता है कि सत्य इतना हाशिए पर कैसे चला गया? लोग इस हद तक उदासीन कैसे हो गए कि उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं रही कि वे जो मानते हैं, उसका तथ्यात्मक आधार है या नहीं?
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